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​मुख़ालिफ़ शायर ने ग़म-ए-शब्बीर को रोकने के लिए कुछ इस तरह से शेर कहा….👇
“कह दो ग़म-ए- हुसैन मनाने वालों को,

कि मुसलमान कभी शहीदों का गम नहीं करते।
करते हैं मोहब्बत अपनी जान से भी ज़्यादा,

यूँ सरे आम इसका तमाशा नहीं करते।
रोएँ वो जो मुनकिर हैं शहादत-ए-हुसैन के,

हम ज़िंदा वा जावेद का मातम नहीं करते..!!”

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मरहूम अली नक़ी साहब ने इस गुस्ताख़ शायर का अपनी किताब में बड़ा अच्छा जवाब दिया…

(किताब का नाम है हलाकत और शहादत)
“गिरया किया याक़ूब ने उनको भी तो टोको,

यूसुफ़ तो अभी ज़िंदा हैं यूँ ग़म नहीं करते।
आदम ने तो हव्वा के लिए पीटा है सीना,

समझाओ उन्हें जिन्दों का मातम नहीं करते।
हमज़ा तो शहीदों के भी सरदार हैं लेकिन,

करते ना मोहम्मद तो चलो हम नहीं करते।
हक़ बात है बस बुग़्ज़-ए-अली का ये चक्कर,

तुम इसलिए शब्बीर का मातम नहीं करते।
अपना कोई मरता है तो रोते हो तड़प कर,

पर सिब्ते पयम्बर का कभी ग़म नहीं करते।
हिम्मत है तो महशर में पयम्बर से ये कहना,

हम ज़िंदा-ओ-जावेद का मातम नहीं करते।
बस एक रिवायत रही है रोज़-ए-अज़ल से,

क़ातिल कभी मक़तूल का मातम नहीं करते..!!”

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